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डिज़ायर

"डिज़ायर" सुबह रंग का लिबास पहने कच्ची इंटों के पार उस दरीचे से झाँकती एक मासूम लड़की  सरसों के खेत में  उड़ती हुई उस तितली को देखती हुई  कुछ सोचती है  तभी शाम रंग का लिबास पहने आ जाते हो तुम!  और अपने नर्म होंठ रख देते हो उसकी पलकों पर और सोच हक़ीक़त में तब्दील हो जाती है जौनसी

तुमसे इक मुलाक़ात, इक उम्र थी

तुमसे इक मुलाक़ात, इक उम्र थी मैं मिल के घर लौट आई हूँ ए अच्छे लड़के मेरे पैरहन की ये ख़ुशबू उन आँसुओ की होगी जो तुम्हारे ग़म में बहाए मेरी बन्द आंखों पे तुमने होंटों से जो दवा लगाई उससे कुछ ज़ख़्म उभरे हैं जो खो चुके थे अब ये पैरहन की ख़ुशबू ये ज़ख़्म ही जीने का सामान हैं! #मैं

रिक़वैस्ट

'रिक़वैस्ट' पिछली मुलाक़ात के आँसूं सूख चुके इसलिए ज़रूरी है इक दफ़ा और मिलना ये ज़मीन सब्ज़ रहे सहरा न होने पाए फूल खिलते रहें ज़ख़्म सिलते रहें सागर भरे ही रहें जंगल हरे ही रहें शामें ढलती रहें रुतें बदलती रहें! इसलिए ज़रूरी है हम फिर मिलें फिर मिलें...और आँसूं बहायें! #मैं

मैं मिलूँगी फिर एक बार

मैं मिलूँगी फिर एक बार तुमसे जल्दी ही.....! और इन लबों से सब झूट ही कहूँगी मैं! हर जवाब झूट , हर बात झूट! बस मेरी आँखें न पढ़ लेना तुम!! तुम मेरी आँखें न पढ़ लेना बस!!!  #जौनसी

आसान नहीं था

आसान नहीं था  तुमसे प्यार न करना  और उससे भी मुश्किल था, हो चुके प्यार को  ज़ाहिर न होने देना !  लेकिन मैं कामयाब हुई  कामयाब हुई ये मुश्किल काम करने में  तुमसे प्यार को कभी न स्वीकारने में  बस तुम ये नज़्म  न पढ़ लेना  ये नज़्म  न पढ़ लेना तुम !!!  #जौनसी 

हवा नहीं तुम

हवा नहीं तुम, आब नहीं तुम क्यों फिर उड़ते चले गए! राह नहीं तुम, बाब नहीं तुम क्यों फिर मुड़ते चले गए!! मोम का कोई अक्श नहीं मैं फिर क्यों पिघलती चली गई...! याद ही थी कोई धूप नहीं थी फिर क्यों दहलती चली गई !! #जौनसी

अनहोनी

ये रंग जो मेरे बदन पे उभर आया है उतर नही पायेगा  ये गहरा पक्का रंग किसी कैमिकल का तो हो नही सकता दुपट्टा भी तो रंग नहीं छोड़ता न ही मौसम ऐसा है ..! तो फिर जिन होंटों ने छुआ ही नहीं उनका रंग .......!!!  कैसे.....? #जौनसी

वो लरज़ती सी बेल

वो लरज़ती सी बेल  जिसको उसकी मिट्टी से अलेदा करके  गाड़ा गया , जिस पेड़ के सहारे थी...  उस की याद में सरशार जी रही है !  हिज्र मौसम का शहद पी रही है!!  #जौनसी 

इस तरह सताएगी

नहीं पता था कि ये इस तरह सताएगी तुम्हारी याद मुझे ला मकां बनायेगी नहीं कहीं भी नहीं कोई ख़्वाब-गाह अपनी तुम्हारी आँख मुझे आसरा दिलाएगी !! #जौनसी

उसने ग़ज़ल कही है

उसने ग़ज़ल कही है, मेरे फ़िराक़ में मेरे तस्व्वुर में, किसी ख़्याल से मोअत्तर* हो के  वो महक रहा है हर सम्त से!  ये ख़ुशबू किसी कैमिकल की होगी ज़रूर  हमारे बीच की केमिस्ट्री के बाइस^  जो थी कभी !  क्योंकि फूल तो अब खिलते ही नहीं  हम तो अब मिलते ही नहीं!  #जौनसी

अश्कों से बारिश

अश्कों से बारिश लिक्खा है  तुमको ये सब कब दिखता है !  #जौनसी

मुझे उसी आवाज़ की धुन है

मुझे उसी आवाज़ की धुन है वही "गुलाबी आवाज़" जो घुलती थी, कानों के बीच खुलती थी, ज़हन की नब्ज़ों पर गुलाबों के जैसे हर ज़ख़्म, हर दर्द मिटा देती थी वो शीरीं आवाज़ वो जादुई आवाज़ वो गुलाबी आवाज़,उसकी आवाज़! गुलाबी रंग किताब में रक्खे गुलाब के जैसे सूख गया है,काला पड़ गया है! #जौनसी

मैं दूर लायी जा रहीं हूँ

मैं दूर लायी जा रहीं हूँ उस जादूगर से जिसकी जानिब बे-सबब ही चली गयी थी मैं जिसकी पेशानी आफ़ताब सरीखी जिसकी बाँहों में तिलिस्म जिसके जिस्म में राहतें बातों में चारागरी सब दर्दों का ईलाज दूर ही से करता था वो अब मैं बीमार हूँ..... बेहद बीमार ....! जादूगर जादू भूल गया ! #जौनसी

वुजूद

एक खोयी लड़की  रोज़ मुझसे आके अपना पता पूछती है  पूछती है कि, वो कौन है, कहाँ रहती है?  उसका घर कहाँ है?  एक वो सरनेम जिसमें वो जन्मी  एक वो जिसमें वो मरने वाली है  लोगों ने उसे कई नाम दिए  पर कोई ये नहीं बता पाया है  कि वो कौन है कहाँ रहती है?  उसका घर कहाँ है?  वो खोयी लड़की  #जौनसी 

सियाह रातों में

अक्सर तवील सियाह रातों में एक ख़्वाब  जागती आँखों से  दिल में उतरता है  उस ख़्वाब में मैं  मेरे फैले हुए हाथों में  नीली स्याही से  जाने किस से मिलन की लकीर बनाती हूँ  स्याही उलट जाती है  मेरे फैले हाथ, मेरी आँखें, मेरे ख़्वाब  सब नीले हो जातें हैं  यहाँ तक की तवील सियाह रातें भी  #जौनसी

ख़ामुशी

वो ख़ामुशी जो तुमने पी ली है शिव के विषपान जैसी  वो मेरे हलक़ में अटक रही है  मैं नीले रंग में नहाई हुई हूँ !  ये रंग नसों में उतर रहा है लहू के साथ  नीले रंग का लहू देखा है कहीं !  ये रंग मुझे जीने नहीं देगा.....  और मरने भी !  #जौनसी

वो कुछ कहने वाले है

वो कुछ कहने वाले है चलती हूँ ! मेरा ही नाम होगा ।। #जौनसी

DelhiRains

इक तेरी दीद के मुन्तज़िर हम  बारिश से दिल सुलगाते हैं !  जब रिमझिम अब्र बरसता है  हम आग से आग बुझाते हैं !!!  ये झरझर करता पानी भी  यूँ भर जाता है आँगन को  फिर हम भी गीली मिट्टी में  यादों की पौध लगाते हैं !!  #जौनसी

रायगाँ

प्यासी धरती के भीतर जा नहीं पाती  ये पक्की सड़कों और पक्के मकानों पे  पड़ती बूंदें उतनी ही फ़िज़ूल हैं जितना  मेरी कत्थई आँखों से बरसता पानी !  ये भी तुम्हारी पक्की हो चुकी  दिल की ज़मीन पर पड़ता ज़रूर है  लेकिन !!!!!  #जौनसी

' मैसेंजर '

जिस वक़्त रात भर बरसी हुई  बेसोयी सुर्ख़ आंखें !  छज्जे से रात भर बारिश में नहाए  सुर्ख़ गुलमोहर को देखें ......  उस वक़्त कोई तुम्हे भी ये बताये  कि मैं सो क्यों नहीं पाती  ये हवा , ये घटा , या ये वक़्त  जो भी तुम तक पहुँच जाये !!!  #जौनसी

'अनासिर'

जब एक ही मिट्टी से बने थे  मैं और तुम  फिर ज़रूर आब और हवा  ही ने अलग किया होगा  और ये आग  इसका क्या  ये आसमान तक जाकर ही बुझे शायद !  शायद हाँ , शायद !  शायद ना , शायद !!  #जौनसी